हमारे बारे में

आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धतियों में से एक है। यह विधा प्राकृतिक विधाओं के साथ सहज जीवनचर्या की मौलिक अवधारणा पर आधारित है। आयुर्वेद को उपवेद भी कहा गया है।

आयुर्वेद, जीवन को जीने का वेद ज्ञान (विज्ञान) है। यह मानव जीवन के पुरूशार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की प्राप्ति का मूल साधन एवं आरोग्य को प्रदान करने वाली है।

आयुर्वेद केवल पारम्परिक चिकित्सा पद्धति नहीं है वरन् पूर्ण वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। आयुर्वेद पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी को पूर्ण आरोग्य प्रदान करता है।

आयुर्वेद का मूल उद्देष्य मानव मात्र को सुखी, स्वस्थ्य एवं पूर्ण निरोगी बनाकर दीर्घायु प्रदान करना है। आयुर्वेद अन्य विज्ञानों की तरह कुछ औशधियों और रोगों की जानकारी देने भर का षास्त्र नहीं है, वरन् यह भौतिक होने के साथ-साथ परम् दार्षनिक भी है।

वर्तमान में समाज एवं विष्व ने अनुभव किया है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान एक रोग का उपचार करता हे परन्तु उसकी अवाँछित प्रतिक्रियाओं के कारण समाज को दुश्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। आज समाज एवं विष्व पुनः अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति, वेदों पर आधारित चिकित्सा विज्ञान ‘‘आयुर्वेद’’ की ओर आकर्शित हुआ है। यूरोपीय देषों तथा अमेरिका जैसे पष्चिमी देषों में आज बड़ी तेजी से आयुर्वेद चिकित्सा के प्रति आकर्शण बढ़ा है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण-नीम, हल्दी आदि जैसी दैनिक उपयोगी वस्तुओं के पेटेण्टीकरण का प्रयास है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण एलोपैथिक चिकित्सा के दुश्प्रभाव तथा आयुर्वेद चिकित्सा का निरापद होना है। इसके अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ रोगों के पुनरावर्तन स्वभाव का उनकी चिकित्सा में कोई उपचार नहीं हैं, क्योंकि एलोपैथिक चिकित्सा मूलतः लक्षणोपषमन करती है, जबकि आयुर्वेद विधा से चिकित्सा अपने विषिश्ट सिद्धान्तों के द्वारा रोगों का समूल विनाष करती है।

आयुर्वेदीय उपचार पद्धति भारत की प्राचीन धरोहर है। ऋषियों के ज्ञान को समय-समय पर लोकहित में आयुर्वेद के मनीषियों ने संशोधन एवं संवर्द्धन के साथ प्रयुक्त किया है। आज सम्पूर्ण विश्व नई-नई व्याधियों/समस्याओं से पीड़ित है। आयुर्वेद पद्धति की चिकित्सा व शिक्षा विश्व कल्याण कर सकने में नितान्त समर्थ हैं।

यदि जन-मानस आयुर्वेद में बताये गये नियमों, ऋतुचर्या, दिनचर्या, आहार-विहार, निद्रा, संयम, सद्वृत्तों की परिकल्पना की षिक्षा, भूमि-जलवायु, वातावरण की शुद्धता के उपायों (पर्यावरण संरक्षण) को सम्मिलित करते हुए अपनी जीवनचर्या का अनुपालन करेगा तो उसको किसी प्रकार की व्याधि नहीं होगी एवं वह चिरायु रहेगा।


आयुर्वेदिक पद्धति:- गतिविधियाँ एवं क्रिया कलाप


भारतीय चिकित्सा पद्धति के माध्यम से प्रदेश के जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना प्रदेश सरकार के संकल्पों में से एक है। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु शासन द्वारा आयुर्वेदिक एवं यूनानी पद्धतियों के सर्वांगीण विकास के लिये गत वर्षों में अनेकानेक महत्वपूर्ण योजनाएं क्रियान्वित की जाती रही है। जिसका सुखद परिणाम है कि वर्तमान में इन विधाओं का एक समेकित समन्वित तथा सुगठित तंत्र प्रदेश के सुदूर ग्रामीण अंचलों तक में विकसित हो सका है।

चिकित्सकीय क्रिया कलाप

नवसृजित उत्तरांचल राज्य के गठन के पश्चात् सम्प्रति उत्तर प्रदेष में वर्तमान में कुल 2105 आयुर्वेदिक चिकित्सालय हैं। इन चिकित्सालयों में कुल 10597 शैय्याएं रोगियों को चिकित्सा हेतु उपलब्ध है एवं प्रतिवर्ष लगभग 1.50 करोड़ रोगियों को आयुर्वेदिक पद्धति के इन शासकीय चिकित्सालयों के माध्यम से चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करायी जाती है।

औषधि निर्माण एवं गुणवत्ता नियंत्रण

प्रदेष के सभी राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालयों को प्रमाणित एवं गुणकारी औषधियों की आपूर्ति की दृष्टि से वर्तमान में लखनऊ एवं पीलीभीत में राजकीय औषधि निर्माणशालाएं कार्यरत है। प्रदेश में आयुर्वेदिक एवं यूनानी औषधियों की गुणवत्ता पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए वर्षः 1977-78 से ड्रग एक्ट लागू कर दिया गया है। प्रदेष में लखनऊ में एक ड्रग टेस्टिंग लैब भी है जो प्रदेष में उपयोग में लाई जा रही औषधियों के संघटन, गुण-दोष आदि का निर्धारण कर गुणवत्ता नियंत्रण में अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है। लखनऊ तथा पीलीभीत स्थित राजकीय फार्मेसियों तथा लखनऊ स्थित ड्रग टेस्टिंग लैब के प्रोन्नयन एवं विस्तार हेतु भारत सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने हेतु शासन द्वारा प्रयास किया जा रहा है।

शिक्षा तथा प्रशिक्षण

प्रदेश में भारतीय चिकित्सा पद्धति के निष्णात् स्नातकों को शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराने की दृष्टि से लखनऊ, पीलीभीत, झासी, बरेली, मुजफ्फरनगर, अर्तरा-बांदा, हंडिया-इलाहाबाद तथा वाराणसी में 8 राजकीय आयुर्वेदिक कालेजों के माध्यम से कुल 320 आयुर्वेदिक स्नातकों को प्रशिक्षित करने के लिये प्रतिवर्ष सी॰ पी॰ एम॰ टी॰ के माध्यम से प्रवेश दिया जाता है।

साहित्य

वर्षः 1950 से राजकीय आयुर्वेदिक कालेज, लखनऊ के परिसर में आयुर्वेदिक एवं तिब्बी अकादमी नामक संस्था कार्यरत है, जिसके माध्यम से आयुर्वेदिक एवं यूनानी के प्राचीन ग्रन्थों, पाण्डुलिपियाँ संकलनों, निघण्टुओं, संहिताओं आदि के प्रकाषन के साथ ही साथ छात्रोपयोगी ग्रन्थों के अनुवाद एवं प्रकाषन का कार्य सम्पादित किया जाता है। इस अकादमी द्वारा अब तक 12 ग्रन्थों का प्रकाशन कार्य किया जा चुका है। एक समृद्ध पुस्तकालय के द्वारा भी यह संस्था अपनी उपयोगिता सिद्ध करती आ रही है। 

भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तर प्रदेश

यह संस्था प्रदेश में आयुर्वेदिक/यूनानी पद्धति से चिकित्सा व्यवसाय कर रहे वैद्यों/हकीमों के पंजीकरण की एकमात्र संस्था है, जो उत्तर प्रदेष इण्डियन मेडिसिन एक्ट 1939 के प्राविधानों के अधीन इनके पंजीकरण का कार्य करती है।